Osho
यह कविता मैने सबसे पहले ओशो के मुंह से ही सुनी थी, तबसे ये कविता मेरी चेतना में इतनी गहरी जगह बना चुकी है कि इसको भूलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो गया है।
ओशो के पढ़ने की शैली बड़ी शानदार थी, मेरी कविता के प्रति रुचि उनकी वजह से ही बढ़ी है।
ये कविता उन्होंने एक प्रवचन में सुनाई थी, जिसमें एक व्यक्ति ने उनसे क्वेश्चन पूछता है "भगवान, मैं बहुत देर से आपकी शरण में आया, फिर भी मन इस तरह से हर समय गुनगुनाता है कि: कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है कि तुमको बनाया गया है मेरे लिए तुम अब से पहले सितारों में बस रहे थे कहीं तुझे जमीं पर उतारा गया है मेरे लिए इसे मन की कौन सी दशा कही जाए?"
तब ओशो ने इसके जवाब में बोला था "इसी को तो मैं दीवानापन कह रहा हूं। यही तो पागलपन है। ऐसे ही दीवानों के लिए तो निमंत्रण है। और ऐसे ही दीवानों का मुझसे कुछ नाता बन सकता है। यह नाता प्रेम का नाता है। यहां कोई गुरु नहीं, यहां कोई शिष्य नहीं; यह प्रेमियों की जमात है।
और इसकी चिंता मत लो कि मैं बहुत देर बाद आपकी शरण में आया। सुबह का भूला सांझ भी घर आ जाए तो भूला नहीं। जब भी आ गए तभी जल्दी है। आ गए यही बहुत। आ गए, यह सौभाग्य है! मगर आकर भी लोग चूक गए हैं। आ-आकर भी लोग चूक गए हैं। आ जाना ही काफी नहीं। उतने से ही तृप्त न हो जाना। अब डूबो भी!
प्रेम की पुकार तुमने सुनी और तुम्हारे हृदय में प्रेम की झंकार भी पैदा हो रही है; उससे डर भी लगेगा। बुद्धि विरोध भी करेगी, एतराज भी उठाएगी, आक्षेप भी करेगी, हजार तरह के तर्क भी खड़े करेगी। लेकिन तुम बुद्धि की सुनना ही मत। हृदय की सुनना और हृदय की गुनना। तो ही इस महफिल में जुड़ पाओगे। नहीं तो कटे-कटे रह जाओगे। आ गए और फिर चूक गए तो और भी बड़ा दुर्भाग्य है।"
और फिर ये कविता पढ़ी -
तू चाहे चंचलता कह ले
तू चाहे निर्बलता कह ले
दिल ने ज्यों ही मजबूर किया
मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा
मैं चातक हूं तू बादल है
मैं लोचन हूं तू काजल है
मैं आंसू हूं तू आंचल है
मैं प्यासा हूं तू गंगाजल है
तू चाहे नादानी कह ले
तू चाहे मनमानी कह ले
जिसने भी मेरा परिचय पूछा
मैं तेरा नाम बता बैठा
मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा
सारा मदिरालय घूम गया
प्याले-प्याले को चूम गया
पर जब तूने घूंघट खोला
मैं बिन पीए ही झूम गया
तू चाहे पागलपन कह ले
तू चाहे तो पूजन कह ले
मंदिर में जब घड़ियाल बजा
मैं तुझको सीस झुका बैठा
मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा
मैं अब तक जान न पाया हूं
क्यूं तुझसे मिलने आया हूं
तू मेरे दिल की धड़कन है
मैं तेरे दर्पण की छाया हूं
तू चाहे तो सपना कह ले
या अनहोनी घटना कह ले
मैं जिस पथ से भी चल निकला
मैं तेरे दर पर आ बैठा
मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा
ये प्यार दीए का तेल नहीं
दो-चार घड़ी का मेल नहीं
यह तो युग युग का बंधन है
कोई गुड़ियों का खेल नहीं
तू चाहे दीवाना कह ले
या अल्हड़ मस्ताना कह ले
मैंने जो भी रेखा खींची
तेरी तस्वीर बना बैठा
मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा
उर की पीड़ा मैं सह न सकूं
कुछ कहना चाहूं कह न सकूं
ज्वाला बनकर भी रह न सकूं
आंसू बनकर भी बह न सकूं
तू चाहे तो रोगी कह ले
या मस्ताना जोगी कह ले
मैं तुझे याद करते-करते
अपना भी होश गंवा बैठा
मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा !!
Comments
Post a Comment