खलक सब रैन का सपना : Kabir Saheb

 खलक सब रैन का सपना

खलक सब रैन का सपना । समझ मन कोई नहीं अपना ॥ कठिन है मोह की धारा । बहा सब जात संसारा ॥ घड़ा जो नीर का फूटा । पत्र ज्यों डार से टूटा ॥ ऐसे नर जात ज़िंदगानी । अजहुँ तौ चेत अभिमानी ॥ निरखि मत भूल तन गोरा । जगत में जीवना थोरा ॥ तजो मद लोभ चतुराई । रहो निसंक जग माही ॥ सजन परिवार सुत दारा । सभी एक रोज़ है न्यारा ॥ निकसि जब प्रान जावैंगे । कोई नहीं काम आवेंगे ॥ सदा जिनि जान यह देही । लगा ले नाम से नेही ॥ कहें कबीर अविनासी । लिये जम काल को फांसी ॥ ~ Kabir Saheb



Comments

Popular Posts